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Home » कैग रिपोर्ट में रेलवे मंत्रालय का चौंकाने वाला खुलासा… जानें क्या
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कैग रिपोर्ट में रेलवे मंत्रालय का चौंकाने वाला खुलासा… जानें क्या

August 19, 2026No Comments6 Mins Read
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रेलवे
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News Samvad : भारतीय रेलवे ने ब्रॉड गेज नेटवर्क के करीब 99.6% हिस्से के विद्युतीकरण का दावा किया है। कागज पर यह आंकड़ा रेलवे के बड़े बदलाव की तस्वीर दिखाता है। लेकिन अब सवाल यह है कि जिस तेजी से ट्रैक पर बिजली पहुंचाई गई, क्या उसी रफ्तार से ट्रेनों को चलाने की पूरी व्यवस्था भी मजबूत हुई है? मुंबई-पुणे रूट पर डेक्कन क्वीन, प्रगति एक्सप्रेस, सिंहगढ़ एक्सप्रेस समेत कुछ ट्रेनों को इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव की कमी के चलते कुछ समय के लिए डीजल इंजन से चलाने की खबरों ने इसी सवाल को और बड़ा कर दिया है। रेलवे ने पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में पुराने डीजल इंजन को सेवा से हटाया है। इसके पीछे मकसद बिजली से चलने वाली ट्रेनों की संख्या बढ़ाना और ईंधन पर होने वाला खर्च कम करना था। लेकिन दूसरी तरफ जरूरत के मुताबिक इलेक्ट्रिक इंजनों की उपलब्धता और उत्पादन बढ़ाने की चुनौती अब सामने दिखाई दे रही है। यानी ट्रैक पर बिजली का इंतजाम हो गया, लेकिन उस बिजली से ट्रेनों को लगातार चलाने के लिए पर्याप्त इंजन उपलब्ध हैं या नहीं, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण सवाल है।

बिजली के तार पहुंचे, लेकिन इंजन की कमी बनी चुनौती

मुंबई-पुणे जैसे व्यस्त रूट पर अगर इलेक्ट्रिक इंजन की कमी के कारण डीजल इंजन का सहारा लेना पड़े, तो यह केवल एक रूट की परेशानी नहीं मानी जा सकती। यह रेलवे के आधुनिकीकरण की पूरी योजना को देखने का एक मौका है। इलेक्ट्रिफिकेशन के बाद रेलवे को पर्याप्त संख्या में इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव, उनके रखरखाव की सुविधा, स्पेयर पार्ट्स और प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारियों की भी जरूरत होती है। रेलवे में बदलाव का मतलब सिर्फ ट्रैक के ऊपर बिजली के तार बिछा देना नहीं है। इंजन, सिग्नलिंग, ट्रैक, स्टेशन, मेंटेनेंस और ट्रेन संचालन, इन सभी को एक साथ मजबूत करना पड़ता है। किसी एक कड़ी के कमजोर पड़ने पर उसका असर सीधे ट्रेन संचालन पर दिखाई देता है। पुराने डीजल इंजन हटाना अपने आप में गलत कदम नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब उनकी जगह पर्याप्त संख्या में इलेक्ट्रिक इंजन समय पर उपलब्ध नहीं हो पाते। रेलवे को यह सुनिश्चित करना होगा कि डीजल इंजन हटाने और नए इलेक्ट्रिक इंजन उपलब्ध कराने के बीच कोई ऐसा अंतर न बने, जिसका असर यात्रियों और ट्रेन संचालन पर पड़े।

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लोको पायलटों की कमी से बढ़ रहा काम का दबाव

रेलवे के सामने इससे भी बड़ी चिंता लोको पायलटों की कमी की है। उपलब्ध आंकड़ों और कर्मचारी संगठनों की ओर से समय-समय पर उठाए गए मुद्दों के मुताबिक लोको पायलटों के हजारों पद खाली हैं। ट्रेन चलाने का काम बेहद जिम्मेदारी वाला है। ऐसे में अगर पर्याप्त संख्या में कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं और मौजूदा कर्मचारियों से ज्यादा ड्यूटी ली जा रही है, तो इसका असर उनकी थकान और काम करने की क्षमता पर पड़ सकता है। लोको पायलट कई घंटे लगातार ट्रेन चलाते हैं। उन्हें रास्ते के सिग्नल, गति, ट्रैक की स्थिति और अचानक सामने आने वाली परिस्थितियों पर लगातार नजर रखनी होती है। ऐसे काम में थोड़ी सी लापरवाही भी भारी पड़ सकती है। इसलिए कर्मचारियों की कमी को सिर्फ मानव संसाधन से जुड़ी समस्या मानना ठीक नहीं होगा।

यह सीधे रेल सुरक्षा से जुड़ा मामला है। सेवानिवृत्त लोको पायलटों को दोबारा काम पर लेने की चर्चा भी इसी कमी की गंभीरता की ओर इशारा करती है। अगर रेलवे को पुराने कर्मचारियों की सेवाएं फिर लेने की जरूरत महसूस हो रही है, तो इससे यह सवाल उठता है कि नए कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण और तैनाती की व्यवस्था समय पर क्यों नहीं मजबूत की गई। रेलवे में तकनीक बढ़ाने के साथ कर्मचारियों की संख्या और उनकी ट्रेनिंग पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है। आधुनिक इंजन और बेहतर सिग्नलिंग तभी काम आएंगे, जब उन्हें संभालने और संचालित करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित कर्मचारी मौजूद हों।

कैग की रिपोर्ट ने बजट खर्च और यात्री सुविधाओं पर भी उठाए सवाल

रेलवे की चुनौती सिर्फ इंजन और लोको पायलटों तक सीमित नहीं है। कैग की रिपोर्ट में रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी कमियां सामने आई हैं। कई स्टेशनों पर पानी, स्वच्छता और दूसरी जरूरी सुविधाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं पाई गई। इससे यह सवाल उठता है कि रेलवे के आधुनिकीकरण का फायदा जमीन पर यात्रियों को कितनी जगह और कितनी तेजी से मिल रहा है। कैग ने रेलवे मंत्रालय की ओर से बजट के इस्तेमाल को लेकर भी चिंता जताई है। रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि बजट में जितनी राशि आवंटित की गई थी, रेलवे उसका पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाया।

कई मामलों में आवंटित राशि के मुकाबले खर्च कम रहा। इसका असर उन योजनाओं पर पड़ता है, जो पर्याप्त बजट उपलब्ध होने के बावजूद समय पर पूरी नहीं हो पातीं और वर्षों तक लंबित रहती हैं।बजट का आवंटन होना और उसका सही समय पर इस्तेमाल होना, दोनों अलग बातें हैं। अगर किसी योजना के लिए पैसा दिया गया, लेकिन जमीन पर काम आगे नहीं बढ़ा या राशि पूरी तरह खर्च नहीं हुई, तो उसका सीधा असर परियोजना की समयसीमा पर पड़ता है। रेलवे जैसे बड़े नेटवर्क में किसी एक परियोजना के लंबे समय तक अटके रहने से कई दूसरी योजनाओं पर भी असर पड़ सकता है।आज रेलवे के सामने असली चुनौती यह है कि वह ट्रैक और स्टेशनों के आधुनिकीकरण के साथ संचालन की पूरी व्यवस्था को भी मजबूत करे। पर्याप्त इलेक्ट्रिक इंजन उपलब्ध हों, लोको पायलटों और दूसरे जरूरी कर्मचारियों की कमी दूर हो, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो, रखरखाव समय पर हो और यात्रियों को पानी, साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलें।

वंदे भारत जैसी नई ट्रेनें और आधुनिक स्टेशन रेलवे की तस्वीर बदलने के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, लेकिन आम यात्री के लिए रेलवे की असली परीक्षा उसकी रोज की यात्रा में होती है। ट्रेन समय पर मिलती है या नहीं, सुरक्षित पहुंचाती है या नहीं, स्टेशन पर जरूरी सुविधा मिलती है या नहीं और कर्मचारियों पर इतना दबाव तो नहीं है कि उसका असर संचालन पर पड़े। इसलिए रेलवे के विद्युतीकरण को बड़ी उपलब्धि मानने के साथ यह भी देखना जरूरी है कि उसके पीछे का पूरा संचालन तंत्र कितना तैयार है। ट्रैक पर बिजली पहुंचाना पहला कदम है। इसके बाद पर्याप्त इंजन, प्रशिक्षित कर्मचारी, सुरक्षा संसाधन, रखरखाव और यात्री सुविधाएं भी उसी गति से मजबूत करनी होंगी। तभी रेलवे का आधुनिकीकरण कागजों से निकलकर आम यात्री के सफर में दिखाई देगा।

इसे भी पढ़ें : त्योहारों से पहले चीनी ने बिगाड़ा मिठास का बजट… जानें कतना बढ़ा भाव

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