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Hazaribagh : सुबह की हल्की धूप के बीच बड़कागांव के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर में शनिवार को एक अलग ही हलचल थी। यहां जुटे लोगों के चेहरों पर बीमारी की वजह से आई थकान और कमजोरी साफ दिख रही थी, लेकिन आंखों में जल्दी ठीक होने की एक उम्मीद भी तैर रही थी। मौका था अदाणी फाउंडेशन की ओर से आयोजित पोषण किट वितरण शिविर का। गोंदुलपारा खनन परियोजना के तहत लगे इस शिविर में 80 टीबी मरीजों को जब पौष्टिक आहार की किट सौंपी गई, तो कई चेहरों पर राहत भरी मुस्कान नजर आई। यह चालू वित्तीय वर्ष का तीसरा शिविर था, जिसका सीधा मकसद दवा के साथ-साथ मरीजों की थाली को भी मजबूत बनाना है।

खाली पेट बेअसर रह जाती हैं कड़वी दवाएं
टीबी के इलाज की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यही है कि इसकी दवाइयां शरीर पर काफी भारी पड़ती हैं। जब तक पेट में भरपूर और पौष्टिक खाना न हो, तब तक इन तेज दवाओं को झेल पाना किसी भी मरीज के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है। कार्यक्रम में मौजूद चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. मिथु हलदर और सीनियर ट्रीटमेंट सुपरवाइजर दीपक कुमार ने बेहद सीधे और अपनेपन भरे अंदाज में मरीजों को यह बात समझाई। उन्होंने साफ कहा कि टीबी कोई लाइलाज बीमारी नहीं है, बशर्ते मरीज अपनी दवा का कोर्स बीच में न तोड़े। अक्सर कमजोरी महसूस होने पर लोग दवा छोड़ देते हैं, जबकि असल जरूरत उस वक्त शरीर को अच्छा खाना देने की होती है।

पोषण किट से मिलेगी बीमारी से लड़ने की ताकत
गांव-देहात के इलाकों में अक्सर देखा जाता है कि मरीज दवा तो सरकारी अस्पताल से ले आते हैं, लेकिन घर की कमजोर आर्थिक स्थिति की वजह से उन्हें जरूरी दाल, दलिया या प्रोटीन युक्त खुराक नहीं मिल पाती। यही कमी उनकी रिकवरी को धीमा कर देती है। शिविर में बांटी गई इस किट की अहमियत यहीं समझ आती है। यह सिर्फ राहत सामग्री नहीं, बल्कि मरीजों के शरीर में रोग से लड़ने वाली ताकत यानी इम्यूनिटी को दोबारा खड़ा करने का एक जरिया है। डॉक्टरों ने मरीजों के साथ आए परिजनों को भी समझाया कि वे मरीज के खाने-पीने और साफ-सफाई का खास ख्याल रखें, ताकि दवा का असर दोगुना हो सके।
सेहतमंद गांव की ओर बढ़ते कदम
हजारीबाग के इस ग्रामीण इलाके में स्वास्थ्य और पोषण को लेकर जागरूकता की आज भी काफी जरूरत महसूस की जाती है। अदाणी फाउंडेशन अपने सीएसआर अभियानों के जरिए इसी खाई को पाटने की कोशिश कर रहा है। संस्था का मानना है कि इलाज की सुविधा तब तक अधूरी है, जब तक मरीज को ठीक होने का पूरा माहौल और सही खुराक न मिले। इस तरह के आयोजनों से न केवल जरूरतमंदों तक सीधी मदद पहुंचती है, बल्कि समाज में टीबी को लेकर फैला डर और झिझक भी दूर होती है। कार्यक्रम के अंत में स्वास्थ्य कर्मियों और फाउंडेशन की टीम ने मरीजों को भरोसा दिलाया कि बीमारी के खिलाफ इस लंबी लड़ाई में वे बिल्कुल अकेले नहीं हैं।
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