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Home » हिंदी को जोड़ने की कोशिश, रांची में एक साझा संकल्प की बैठक
झारखंड

हिंदी को जोड़ने की कोशिश, रांची में एक साझा संकल्प की बैठक

December 21, 2025No Comments3 Mins Read
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Ranchi : एक होटल का सभागार, सामने बैठी अलग-अलग उम्र और पृष्ठभूमि के लोग, और सबके बीच एक साझा भाव। हिंदी के लिए कुछ करने का। राजधानी रांची के लालपुर स्थित होटल सिटी पैलेस में जब हिंदी साहित्य भारती, झारखंड प्रदेश की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक शुरू हुई, तो यह सिर्फ एक औपचारिक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं था। यह भाषा, संस्कृति और समाज को जोड़ने का एक प्रयास था। बैठक में शामिल लोग केवल पदाधिकारी नहीं थे। कोई शिक्षक था, कोई अधिवक्ता, कोई समाजसेवी और कोई युवा कार्यकर्ता। सभी के मन में एक ही सवाल था कि हिंदी को आम जीवन से कैसे जोड़ा जाए।

नई टीम, नई जिम्मेदारियां

बैठक की शुरुआत नवगठित प्रदेश इकाई की औपचारिक घोषणा से हुई। प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने सभी पदाधिकारियों का परिचय कराया और जिम्मेदारियों की जानकारी दी। माहौल औपचारिक जरूर था, लेकिन बातचीत में अपनापन साफ झलक रहा था।
कार्यक्रम का संचालन कर रहीं प्रदेश महामंत्री डॉ सुनीता कुमारी ने बैठक को संतुलित और संवादपूर्ण बनाए रखा।

हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, पहचान है

मुख्य अतिथि और संगठन के राष्ट्रीय महामंत्री रामनिवास शुक्ल ने जब बोलना शुरू किया, तो सभागार पूरी तरह शांत हो गया। उन्होंने कहा कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक एकता की पहचान है।
उनकी बातों में यह चिंता भी दिखी कि भाषा तब तक जीवित रहती है, जब तक वह गांव, कस्बे और आम लोगों से जुड़ी रहती है।

संगठन की मजबूती पर साफ संदेश

प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने साफ शब्दों में कहा कि संगठन तभी मजबूत होगा, जब जिला इकाइयां सक्रिय होंगी और बैठकें नियमित होंगी। उन्होंने ऑनलाइन और प्रत्यक्ष बैठकों को जरूरी बताया और सदस्यों से केवल नाम के नहीं, बल्कि सक्रिय कार्यकर्ता बनने की अपील की।

कोष संग्रह और जमीन पर काम की बात

बैठक में कोष संग्रह को लेकर भी खुलकर चर्चा हुई। यह स्वीकार किया गया कि बिना संसाधन के संगठनात्मक काम आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए पारदर्शी और व्यावहारिक तरीकों से कोष जुटाने पर सहमति बनी। साथ ही हर जिले में संगठन की सक्रिय उपस्थिति को जरूरी बताया गया, ताकि साहित्यिक गतिविधियाँ केवल शहरों तक सीमित न रहें।

विचार, अनुशासन और दीर्घकालिक सोच

प्रदेश प्रभारी डॉ अरुण कुमार सज्जन ने संगठन की वैचारिक प्रतिबद्धता पर बात रखी। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य भारती की पहचान केवल कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि अनुशासन और दीर्घकालिक सोच से बनती है।

हर आवाज को मिला मंच

बैठक का सबसे मानवीय पक्ष तब सामने आया, जब सभी सदस्यों को 2-2 मिनट में अपनी बात रखने का अवसर दिया गया। वरिष्ठ समाजसेवी शंकर दुबे, शिक्षक विजय कुमार शर्मा, डॉ अटल पांडेय, वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक कुमार शुक्ला सहित कई सदस्यों ने अपने अनुभव साझा किए। किसी ने गांव तक पहुंच की बात की, तो किसी ने युवाओं को जोड़ने पर जोर दिया।

एक बैठक, कई उम्मीदें

कार्यक्रम के अंत तक यह साफ हो गया कि यह बैठक केवल निर्णयों तक सीमित नहीं रही। यह एक ऐसा मंच बना, जहां लोग अपनी भाषा और साहित्य को लेकर चिंता भी साझा कर सके और उम्मीद भी। बड़ी संख्या में मौजूद सदस्यों की उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि हिंदी साहित्य भारती झारखंड में केवल संगठन नहीं, बल्कि एक साझा सोच के रूप में आगे बढ़ रही है। यह बैठक संगठन को नई दिशा देने के साथ-साथ हिंदी के प्रति समर्पण और जुड़ाव की एक जीवंत तस्वीर छोड़ गई।

इसे भी पढ़ें : हिंदी साहित्य भारती झारखंड की बड़ी बैठक रांची में… जानें कब

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