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Home » सीएम हेमंत ने राष्ट्रपति-पीएम को लिखा पत्र, जनगणना 2027 में सरना कोड का आग्रह
झारखंड

सीएम हेमंत ने राष्ट्रपति-पीएम को लिखा पत्र, जनगणना 2027 में सरना कोड का आग्रह

May 3, 2026No Comments4 Mins Read
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Ranchi : झारखंड की धरती एक बार फिर अपनी आदिवासी अस्मिता और पहचान के सवालों को लेकर केंद्र में है। इस बार बहस का केंद्र है “सरना धर्म” को जनगणना में अलग धार्मिक कोड दिलाने की मांग, जिसे लेकर राज्य के सीएम हेमंत सोरेन एक बार फिर एक्टिव मोड में आ गये हैं। राजनीतिक गलियारों से लेकर गांव-गांव तक यह मुद्दा चर्चा में है कि क्या आदिवासी समुदाय की प्रकृति-आधारित आस्था को आधिकारिक रूप से अलग धार्मिक पहचान मिलनी चाहिए। इसी को लेकर सीएम हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्यपाल संतोष गंगवार को पत्र लिखकर 2027 की जनगणना में सरना धर्म के लिए अलग कोड की मांग को दोहराया है।

जनगणना 2027 : सिर्फ आंकड़े नहीं, पहचान की कसौटी

सीएम हेमंत सोरेन का कहना है कि 2027 की जनगणना केवल जनसंख्या गणना का अभ्यास नहीं है, बल्कि यह आने वाले वर्षों की नीतियों, योजनाओं और संसाधन वितरण की बुनियाद तय करेगी। ऐसे में किसी भी समुदाय की पहचान का अधूरा या गलत दर्ज होना, सीधे तौर पर उनके अधिकारों और विकास पर असर डाल सकता है। उनके अनुसार, पिछली जनगणना 2021 विभिन्न कारणों से स्थगित हो गई थी, इसलिए अब यह अवसर और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हर समुदाय की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को सही तरीके से दर्ज किया जाए।

“सरना” सिर्फ धर्म नहीं, जीवन पद्धति

सरना धर्म को लेकर आदिवासी समाज की दलील वर्षों से एक जैसी रही है… यह केवल आस्था नहीं, बल्कि जीवन से जुड़ा एक संपूर्ण दर्शन है। सीएम हेमंत सोरेन ने अपने पत्र में भी यही बात दोहराई है कि सरना परंपरा प्रकृति केंद्रित है, जिसमें जल, जंगल और जमीन की पूजा को केंद्रीय स्थान प्राप्त है। ग्राम देवता, कुल देवता और प्राकृतिक शक्तियों की आराधना इसके मूल में है। पारंपरिक पर्व-त्योहार, सामूहिक पूजा पद्धति और प्रकृति के साथ गहरा जुड़ाव इसे अन्य धर्मों से अलग पहचान देते हैं। ऐसे में इसे किसी बड़े धार्मिक वर्ग में समाहित कर देना, इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करता है। यही आदिवासी संगठनों की मुख्य चिंता रही है।

2011 की जनगणना का संदर्भ और बढ़ती मांग

2011 की जनगणना का हवाला देते हुए सीएम ने बताया कि उस समय “सरना” के लिए अलग कोड नहीं था, लेकिन इसके बावजूद देशभर के करीब 21 राज्यों में लगभग 50 लाख लोगों ने अपनी पहचान “सरना” के रूप में दर्ज कराई थी। यह आंकड़ा इस बात का संकेत माना जा रहा है कि यह मांग केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक स्तर पर भी गहराई से जुड़ी हुई है।

राष्ट्रपति से संवैधानिक संरक्षण की अपील

राष्ट्रपति को लिखे पत्र में सीएम हेमंत सोरेन ने आदिवासी समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के संरक्षण को संविधान की मूल भावना से जुड़ा बताया। उनका कहना है कि आदिवासी समुदायों की विशिष्ट पहचान को सुरक्षित रखना केवल नीतिगत मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी भी है।

पीएम मोदी को याद दिलाया पिछला पत्राचार

पीएम नरेंद्र मोदी को भेजे गए पत्र में सीएम हेमंत सोरेन ने यह भी उल्लेख किया कि उन्होंने पहले भी 2023 में इस विषय पर पत्राचार किया था। साथ ही यह भी बताया कि झारखंड विधानसभा पहले ही इस मुद्दे पर प्रस्ताव पारित कर चुकी है। उनका तर्क है कि यदि जनगणना में पहचान स्पष्ट और अलग नहीं होगी, तो भविष्य की योजनाएं और कल्याणकारी नीतियां भी वास्तविक जरूरतों को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं कर पाएंगी।

राज्यपाल से सिफारिश की मांग

राज्यपाल संतोष गंगवार को लिखे पत्र में मुख्यमंत्री ने झारखंड की सांस्कृतिक नींव को आदिवासी परंपराओं से जुड़ा बताया। उन्होंने आग्रह किया कि राज्यपाल इस विषय को केंद्र के समक्ष सकारात्मक सिफारिश के रूप में आगे बढ़ाएं, ताकि आदिवासी पहचान से जुड़ी यह लंबित मांग निर्णायक स्तर तक पहुंच सके।

पहचान, नीति और भविष्य की बहस

इस पूरे विवाद के केंद्र में केवल एक “धर्म कोड” नहीं, बल्कि डेटा की राजनीति और पहचान का सवाल है। सरकार का मानना है कि सटीक आंकड़ों के बिना न तो योजनाएं प्रभावी हो सकती हैं और न ही संसाधनों का न्यायसंगत वितरण संभव है। वहीं आदिवासी संगठनों का तर्क है कि सरना धर्म को अलग मान्यता मिलना उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता और ऐतिहासिक पहचान को स्वीकार करने जैसा होगा। सीएम का कहना है कि “तथ्य आधारित नीति” के लिए जरूरी है कि हर समुदाय की सही पहचान और आंकड़े उपलब्ध हों।

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