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Pakur (Jaydev Kumar) : रमजान की एक सुकून भरी शाम, पाकुड़ शहर की फिजा कुछ अलग ही थी। ढलती धूप, हल्की ठंडी हवा और इफ्तार का इंतजार करते रोजेदारों की आंखों में चमक… इन सबके बीच हाजी तनवीर की ओर से आयोजित इफ्तार पार्टी महज एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने का जरिया बन गई।
अजान से ठीक पहले हर कोई खामोशी से दुआ में डूबा था। किसी ने अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए हाथ उठाए, तो किसी ने मुल्क में अमन-चैन की कामना की। जैसे ही अजान की आवाज गूंजी, सबने खजूर और पानी से रोजा खोला। उस पल में ना कोई छोटा था, ना बड़ा… सभी बराबर थे।
एक ही दस्तरखान, कई चेहरे, एक एहसास
इफ्तार के दस्तरखान पर शहर के अलग-अलग तबकों के लोग साथ बैठे। समाजसेवी, व्यापारी, शिक्षक, युवा और बुजुर्ग—सबने मिलकर रोजा खोला। पास बैठे एक बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा, “रमजान हमें सिखाता है कि भूख और प्यास का एहसास क्या होता है, ताकि हम दूसरों का दर्द समझ सकें।” वहीं एक युवा ने कहा कि ऐसे आयोजनों से समाज में दूरियां कम होती हैं। “जब हम साथ बैठकर खाना खाते हैं, तो दिलों की दूरियां अपने आप मिट जाती हैं,” उसने कहा।
हाजी तनवीर की पहल: रिश्तों को जोड़ने की कोशिश
इस इफ्तार पार्टी के मेजबान हाजी तनवीर ने बेहद सादगी से कहा, “रमजान का महीना हमें मोहब्बत, सब्र और भाईचारे का पैगाम देता है। अगर हम इस महीने की सीख को पूरे साल निभाएं, तो समाज में नफरत की कोई जगह नहीं बचेगी।” उनकी इस पहल को लोगों ने सराहा। कई लोगों ने इसे सामाजिक एकता की मिसाल बताया। आयोजन में व्यवस्था भी बेहद सुव्यवस्थित रही… मेहमानों के बैठने, इफ्तार के पकवान और नमाज की तैयारी सब कुछ सोच-समझकर किया गया था।
नमाज के बाद की खामोश ताकत
इफ्तार के बाद जब सभी ने मिलकर नमाज अदा की, तो माहौल में एक अजीब सी शांति थी। नमाज के बाद लोग एक-दूसरे से गले मिले। उस पल में धर्म, जाति और पहचान से ऊपर उठकर सिर्फ इंसानियत नजर आ रही थी।
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