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Pawan Thakur, Ranchi
झारखंड की सियासत जब भी मंचों से गूंजती है, तो उसमें शिबू सोरेन के तेवर और आदिवासियों के हक की हुंकार सुनाई देती है। मगर इतिहास अक्सर उन दीवारों के पीछे झांकना भूल जाता है, जहां से यह आंदोलन अपनी खुराक पाता था। बुधवार को जब रांची के अस्पताल में रूपी सोरेन की सांसों की डोर टूटी, तो सिर्फ एक मुख्यमंत्री के सिर से मां का साया नहीं उठा, बल्कि उस पूरी सदी की मूक तपस्या शांत हो गई जिसने आंदोलन के अंगारों पर अपना आंचल बिछा रखा था।
वे दिशोम गुरु शिबू सोरेन की सबसे बड़ी ताकत थीं और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए दुनिया की सबसे ठंडी छांव। बाहर नारे शिबू के गूंजते थे, लेकिन उस बियाबान में चूल्हा रूपी सोरेन ही फूंकती थीं। उनके जाने के साथ ही झारखंड के जनआंदोलन की पहली पीढ़ी की आखिरी मजबूत कड़ी हमेशा के लिए विदा हो गई।
जंगल में छिपते गुरुजी, दहलीज पर अकेली खड़ी रूपी
सत्तर और अस्सी के दशक का झारखंड आज जैसा नहीं था। उस दौर में महाजनी प्रथा के खिलाफ उठी चिंगारी ने एक बड़ा रूप ले लिया था। शिबू सोरेन की एक आवाज पर हजारों तीर-धनुष उठ खड़े होते थे, लेकिन बदले में हुकूमत का कहर टूटता था नेमरा गांव के उस कच्चे घर पर।
जब गुरुजी जंगलों, पहाड़ों और बीहड़ों में रातें काटते हुए आंदोलन की अलख जगा रहे थे, तब घर की दहलीज पर रूपी सोरेन अकेली खड़ी थीं। कभी आधी रात को पुलिस की भारी बूटों की आवाजें आतीं, कभी पूरे घर को घेर लिया जाता। पुलिस पूछती, “शिबू कहां है?” और रूपी सोरेन अपने नन्हें बच्चों को सीने से चिपकाए पत्थर की तरह अडिग खड़ी रहतीं। न आंखों में खौफ, न जुबान पर कोई शिकायत। उन्होंने आंदोलन के उस सबसे क्रूर दौर को न सिर्फ सहा, बल्कि परिवार की रीढ़ बनकर गुरुजी को इस फिक्र से आजाद रखा कि घर का क्या होगा।
जब खाने को दाना नहीं था, तब हौसले से जलाया चूल्हा
आंदोलन सिर्फ नारों से नहीं चलता, उसके पीछे भूखे पेट की एक कड़वी हकीकत होती है। गुरुजी महीनों घर नहीं लौटते थे। ऐसे में रूपी सोरेन के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता था कि बच्चों का पेट कैसे भरेगा।
कई बार घर में अनाज का एक दाना नहीं होता था। जंगल से कंद-मूल जुगाड़ कर लाना, महुआ बीनना और किसी तरह चूल्हा जलाना, रूपी सोरेन की जिंदगी का हिस्सा बन गई थी। कभी गांव के समर्थकों ने थोड़ा चावल पहुंचा दिया तो ठीक, वरना पानी पीकर रातें काटना उनके लिए आम बात थी। उन्होंने कभी अपने पति से यह नहीं कहा कि यह रास्ता छोड़ दो। वे जानती थीं कि शिबू जिस रास्ते पर चल रहे हैं, वह पूरे समाज की मुक्ति का रास्ता है। खुद भूखी रहकर उन्होंने अपने बच्चों को बड़ा किया और गुरुजी के संघर्ष को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया।
मंचों से दूर, पर हर फैसले की सबसे मजबूत धुरी
झारखंड मुक्ति मोर्चा बना, रैलियां हुईं, दिल्ली तक आवाज पहुंची, लेकिन पूरे सफर में रूपी सोरेन कभी मंचों पर आगे नहीं दिखीं। उन्हें प्रचार का कोई शौक नहीं था। वे न माइक संभालती थीं, न भाषण देती थीं। उनकी दुनिया वही थी, जहां आंदोलन के थके-हारे साथी शरण पाते थे।
जो भी कार्यकर्ता रात-बिरात घर पहुंचता, रूपी सोरेन कभी उसे बिना खाए नहीं जाने देती थीं। चाहे रात के दो बजे हों, वे उठतीं और जो कुछ भी रुखा-सूखा होता, प्यार से परोस देती थीं। कार्यकर्ता उन्हें मां कहते थे, क्योंकि आंदोलनकारियों के लिए वह घर किसी सुरक्षित किले से कम नहीं था, जिसकी पहरेदार खुद रूपी सोरेन थीं। गुरुजी जब भी जेल से छूटकर आते या किसी गहरे राजनीतिक भंवर में फंसते, तो रूपी सोरेन की एक शांत नजर उनकी सारी थकान मिटा देती थी। वे शिबू सोरेन की सबसे बड़ी सलाहकार थीं, जो बोलती बहुत कम थीं लेकिन समझती सब कुछ थीं।
बेटों के संघर्ष में बनीं ढाल, सीएम की सबसे ठंडी छांव
जब आंदोलन के बाद सियासत का नया दौर शुरू हुआ और जिम्मेदारी अगली पीढ़ी यानी हेमंत सोरेन के कंधों पर आई, तब भी रूपी सोरेन की भूमिका नहीं बदली। वे सत्ता की चकाचौंध से हमेशा दूर रहीं, लेकिन बेटे के लिए वे सबसे महफूज ठिकाना बनी रहीं।
राजनीति के उतार-चढ़ाव, जांच एजेंसियों के छापे, जेल जाना और सत्ता के दबाव, हेमंत सोरेन ने अपने जीवन में जब भी सबसे कठिन दौर देखा, वे सीधे मां के पास पहुंचे। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाला शख्स जब मां के कमरे में कदम रखता, तो वह सिर्फ एक बेटा बन जाता था। हेमंत खुद कहते थे कि बाबा के जाने के बाद मां ही उनकी सबसे बड़ी छांव थीं। मां का एक बार सिर पर हाथ फेर देना, उनकी हर मुश्किल को आसान कर देता था। आज वह ठंडी छांव हमेशा के लिए छिन गई है।
व्हीलचेयर पर राष्ट्रपति भवन में थामा था जिंदगी भर का मान
जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर जब बीमारियां घेर चुकी थीं, तब तीन महीने पहले देश की राजधानी में एक ऐसा मंजर देखने को मिला जिसने हर किसी का कलेजा छू लिया। राष्ट्रपति भवन के भव्य दरबार हॉल में दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान दिया जा रहा था।
उस ऐतिहासिक दिन यह सम्मान लेने कोई और नहीं, बल्कि व्हीलचेयर पर बैठकर खुद रूपी सोरेन पहुंची थीं। शरीर बेहद कमजोर था, हाथ कांप रहे थे, लेकिन आंखों में अपने जीवनसाथी के लिए एक गहरा संतोष था। जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रोटोकॉल तोड़कर आगे झुकते हुए उनके कांपते हाथों में वह पदक सौंपा, तो वह सिर्फ एक पदक का हस्तांतरण नहीं था। वह उस पूरी आधी सदी की तपस्या को देश का सलाम था, जिसे रूपी सोरेन ने जंगल के कच्चे मकान से शुरू किया था। वह सम्मान उनके पूरे जीवन के संघर्ष का मुकम्मल पड़ाव बन गया।
सूनी दहलीज और खाली आंचल छोड़ अनंत यात्रा पर
बीते कुछ दिनों से अस्पताल के वेंटिलेटर पर जिंदगी और मौत की जो जंग चल रही थी, बुधवार को वह थम गई। डॉक्टरों की कोशिशें और पूरे राज्य की दुआएं भी उस सांस की डोरी को थाम न सकीं।
रूपी सोरेन का जाना सिर्फ एक परिवार का निजी दुख नहीं है। यह उस दौर का अंत है जब झारखंड के सपनों को नारों से ज्यादा त्याग और आंसुओं से सींचा गया था। आज नेमरा का वह पुराना आंगन भी सूना है और रांची का मुख्यमंत्री आवास भी। जिस मां ने आंधियों के सामने हमेशा अपना आंचल फैलाकर अपनों को महफूज रखा, वह आज प्रकृति की शांत गोद में समा गई हैं। पीछे छूट गई है संघर्ष की एक अमर दास्तान और एक खाली घर, जहां अब कोई यह पूछने वाला नहीं बचा कि बेटा, बहुत थक गए हो क्या?
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