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Pakur (Jaydev Kumar) : पाकुड़ समाहरणालय का सभागार… जहां आम दिनों में फाइलों और आदेशों की चर्चा होती है, वहीं इस दिन मुस्कुराहटों और बधाइयों का माहौल था। वजह भी खास थी… 31 साल से पदोन्नति का इंतजार कर रहे 22 लिपिकों को आखिरकार प्रधान लिपिक का पद मिला। इन 22 लिपिकों में से कई ऐसे हैं जिन्होंने अपनी सेवा की शुरुआत 1990 के दशक में की थी। तब से वे हर साल उम्मीद करते थे कि शायद इस बार उनका नंबर आएगा। पर साल दर साल बीतते गए, और उम्मीद धीरे-धीरे एक आदत बन गई… इंतजार की आदत। शुक्रवार को जब जिला स्थापना समिति की बैठक में डीसी मनीष कुमार ने पदोन्नति सूची जारी की, तो कई आंखों में खुशी के साथ राहत भी झलक रही थी। किसी ने कहा, “अब लगता है मेहनत का फल सच में देर से ही सही, लेकिन मिलता जरूर है।”
बैठक में छलकी खुशी, भावनाओं का मिला सम्मान
डीसी मनीष कुमार की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में स्थापना शाखा से जुड़ी कई बातें रखी गईं, लेकिन असली पल तब आया जब पदोन्नति की घोषणा हुई। समाहरणालय के गलियारे में बधाई देने वालों की कतार लग गई। कुछ लिपिकों ने अपने सहयोगियों को गले लगाकर खुशी जताई, तो कुछ चुपचाप फोन पर घर वालों को यह खबर सुनाने में व्यस्त थे।
पदोन्नति अधिकार नहीं, जिम्मेदारी है : डीसी मनीष कुमार
डीसी मनीष कुमार ने इस मौके पर कहा, “पदोन्नति केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और भरोसे का प्रतीक है। प्रशासन तभी मजबूत बनता है जब हर कर्मचारी अपनी भूमिका ईमानदारी और समर्पण से निभाए।” उन्होंने स्थापना शाखा की टीम की सराहना की और सभी नव-प्रोन्नत प्रधान लिपिकों को बधाई दी। उनके शब्दों में औपचारिकता कम और अपनापन ज्यादा था… शायद यही इस दिन को खास बना गया।
“अब लगेगा मेहनत व्यर्थ नहीं गई”
पदोन्नति पाने वाले लिपिकों ने डीसी से मुलाकात कर आभार जताया। किसी ने कहा, “हमने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी थी।” तो किसी ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब घर में भी दीवाली जल्दी आ गई।” इन भावनाओं में एक गहरी राहत थी… वर्षों की मेहनत, इंतजार और संघर्ष के बाद मान्यता मिलने की।

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