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Ranchi : ऊंची दीवारें, लोहे की सलाखें और सख़्त पहरा—होटवार स्थित बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा की सुबह आम दिनों जैसी ही थी। लेकिन इस बार माहौल कुछ अलग था। बंदियों की आंखों में एक सवाल था… “शायद आज बात सुनी जाए।” वजह थी जेल के भीतर लगी जेल अदालत, जहां कानून सिर्फ कागज़ों में नहीं, इंसानों की ज़िंदगी से जुड़कर सामने आया।
जहां अदालत आई बंदियों के पास
जेल अदालत का आयोजन झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार के कार्यपालक अध्यक्ष न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद के निर्देश पर किया गया। रांची डालसा के अध्यक्ष न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा-1 के मार्गदर्शन में और डालसा सचिव राकेश रौशन की देखरेख में यह पहल हुई। मकसद साफ़ था… जिनकी आवाज बाहर तक नहीं पहुंच पाती, उनकी बात यहीं सुनी जाए।
न्यायिक दंडाधिकारी खुशबू त्यागी, सृष्टि कुमारी और मनीष कुमार ने अदालत की कार्यवाही संभाली। जेल प्रशासन के अधिकारी और कर्मचारी भी मौजूद रहे, ताकि हर प्रक्रिया पारदर्शी रहे।
14 कहानियां, एक उम्मीद
इस जेल अदालत में 14 बंदियों ने अपने-अपने मामलों को अदालत के सामने रखा। कोई सालों से तारीखों का इंतजार कर रहा था, तो कोई कानूनी जानकारी के अभाव में आगे बढ़ ही नहीं पा रहा था। सुनवाई के दौरान सवाल भी हुए, समझाया भी गया और कानून के रास्ते भी बताए गए।
इन 14 कहानियों में से एक कहानी का अंत आजादी पर हुआ। एक बंदी को जेल अदालत का लाभ मिला और उसे रिहा कर दिया गया। रिहाई का आदेश सुनते ही उसकी आंखें नम हो गईं। वो आंसू, जो लंबे इंतजार के बाद राहत बनकर गिरे।

कानून की भाषा नहीं, इंसानों की बात
जेल अदालत के साथ लगे विधिक जागरूकता शिविर में बंदियों को सरल शब्दों में बताया गया कि अगर वे वकील नहीं कर सकते, तो नालसा और डालसा की ओर से उन्हें मुफ्त कानूनी सहायता मिलती है। कई बंदियों के लिए यह जानकारी नई थी। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि कानून सिर्फ सज़ा नहीं, सहारा भी देता है।
सेहत भी है जरूरी
आज के दिन सिर्फ कागजी फाइलें ही नहीं खुलीं, बल्कि मेडिकल कैंप भी लगा। डॉक्टरों ने बंदियों की स्वास्थ्य जांच की। किसी को दवा मिली, किसी को सलाह। जेल के भीतर यह संदेश साफ था… इंसाफ के साथ इंसानियत भी जरूरी है।

एक दिन पहले का भरोसा
जेल अदालत से एक दिन पहले न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा-1 और मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी रांची एसबी शर्मा ने जेल का निरीक्षण किया था। उन्होंने साफ-सफाई, स्वास्थ्य जांच और बंदियों की समस्याओं को गंभीरता से सुनने के निर्देश दिए थे। शायद उसी भरोसे के साथ बंदी इस अदालत में पहुंचे थे।
सलाखों के बीच जगी नई रोशनी
जेल अदालत का यह दिन सिर्फ एक बंदी की रिहाई का दिन नहीं था, बल्कि उन तमाम बंदियों के लिए उम्मीद का संदेश था, जो अब भी इंतजार में हैं। यहां कानून ने सख़्ती नहीं, संवेदना दिखाई। और सलाखों के बीच यह एहसास गूंजा… इंसाफ देर से सही, दरवाजा खटखटाने पर आता जरूर है।
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