अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Ranchi : सिसकियों से भरा वो कमरा अब धीरे-धीरे फिर से खिलखिलाने लगा है। कुछ दिन पहले तक जहां हर कोना डर और अनिश्चितता की कहानी कह रहा था, वहीं अब उम्मीद की हल्की किरण दिखने लगी है। यह कहानी है रांची के प्रेमाश्रय शेल्टर होम की, जहां 13 मासूम बच्चियों ने डर के साये से निकलकर फिर से भरोसा करना सीखा।
जब एक घटना ने सबकुछ बदल दिया
एक बच्ची के अचानक लापता होने की खबर ने शेल्टर होम की बाकी बच्चियों को अंदर तक हिला दिया। रातें लंबी हो गईं, नींद गायब हो गई और हर छोटी आवाज उन्हें चौंका देने लगी। “दीदी, हम यहां सुरक्षित हैं ना?” यह सवाल हर बच्ची की आंखों में दिख रहा था। उनके लिए शेल्टर होम, जो कभी सहारा था, अचानक डर की जगह बन गया।
आंसुओं के बीच ढूंढी जा रही थी हिम्मत
कई बच्चियां लगातार रो रही थीं। कोई चुपचाप कोने में बैठ जाती, तो कोई घर जाने की जिद करने लगती। उनकी हालत सिर्फ डर नहीं, बल्कि भरोसे के टूटने की थी। शेल्टर होम का स्टाफ भी उन्हें संभालने की कोशिश में लगा था, लेकिन हालात आसान नहीं थे।
फिर पहुंची एक टीम… सिर्फ अफसर नहीं, सहारा बनकर
जैसे ही मामला जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डालसा) तक पहुंचा, तुरंत कदम उठाए गए। डालसा सचिव राकेश रौशन अपनी टीम के साथ शेल्टर होम पहुंचे। उनके साथ डिप्टी एलएडीसी राजेश कुमार सिन्हा, पीएलवी साहिष्ता प्रवीण और मुन्नी देवी भी थीं। लेकिन यह दौरा सिर्फ औपचारिक नहीं था… यह एक मानवीय पहल थी।
काउंसलिंग नहीं, दिल से दिल की बात हुई
टीम ने बच्चियों को एक कमरे में इकट्ठा किया, लेकिन वहां कोई औपचारिक माहौल नहीं था। वे उनके बीच बैठ गए… जैसे अपने ही हों। किसी ने उनके सिर पर हाथ फेरा, किसी ने उनकी बात ध्यान से सुनी। धीरे-धीरे बच्चियां खुलने लगीं। उन्होंने अपने डर बताए, अपनी बेचैनी साझा की, और वो सवाल पूछे जो उनके मन में लगातार घूम रहे थे।
भरोसे की डोर फिर से जुड़ी
काफी देर तक चली बातचीत और समझाइश के बाद माहौल बदलने लगा। जो बच्चियां पहले डरी-सहमी थीं, वे अब थोड़ा सहज दिखने लगीं। उन्हें भरोसा दिलाया गया कि वे सुरक्षित हैं, और उनकी हर चिंता को गंभीरता से लिया जाएगा।
फिर लौटी मुस्कान, फिर जगी उम्मीद
काउंसलिंग के बाद सबसे बड़ा बदलाव उनके चेहरों पर दिखा।
आंसुओं की जगह अब हल्की मुस्कान थी। बच्चियों ने फिर से शेल्टर होम में रहने की हामी भरी… यह सिर्फ एक निर्णय नहीं, बल्कि भरोसे की वापसी थी।
सिर्फ एक दिन नहीं, हर हफ्ते मिलेगा साथ
डालसा सचिव राकेश रौशन ने बच्चियों से वादा किया कि वे हर हफ्ते उनसे मिलने आएंगे। यह वादा उनके लिए एक सुरक्षा कवच जैसा है—कि वे अकेली नहीं हैं।
इसे भी पढ़ें : किसकी है ये कोख, किसका है ये दर्द… दो विक्षिप्त बेनाम जिंदगियों का डालसा का सहारा



