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Pakur (Jaydev Kumar) : अस्पताल के गलियारे में जब किसी तीमारदार को डॉक्टर यह कहता है कि फौरन दो यूनिट खून का इंतजाम कीजिए, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक जाती है। उस वक्त न जात काम आती है, न धर्म, काम आता है तो बस किसी अनजान इंसान का दिया हुआ रक्त। पाकुड़ के ब्लड बैंक में सोमवार का नजारा कुछ ऐसा ही था, जहां किसी ने किसी का नाम नहीं पूछा, बस आस्तीनें चढ़ाईं और दूसरों की रगों में नई जिंदगी दौड़ाने का संकल्प ले लिया। जिला प्रशासन और जिला स्वास्थ्य समिति की इस साझा पहल ने यह साबित कर दिया कि जब बात इंसानियत की आती है, तो पूरा शहर एक परिवार की तरह उठ खड़ा होता है।
जब बंदूक और खदान की धूल छोड़, जिंदगी संवारने लगे हाथ
आमतौर पर पुलिसकर्मियों को देखकर लोगों के मन में कानून, नियम और खाकी की सख्ती का ख्याल आता है। वहीं दूसरी तरफ खदानों में पसीना बहाते मजदूरों और कर्मचारियों की पहचान उनकी दिन-रात की कड़ी मशक्कत से होती है। लेकिन सोमवार को तस्वीर बिल्कुल जुदा थी। जो हाथ रोज कानून व्यवस्था संभालते हैं, वे रक्तदान के बेड पर लेटे सुकून से मुस्कुरा रहे थे। पुलिस विभाग के जवानों ने अकेले 35 यूनिट रक्तदान किया, वहीं अलुबेरा बटालियन के जवानों ने भी 6 यूनिट खून देकर अपना फर्ज निभाया। उधर स्टोन और कोल माइनिंग से जुड़े लोगों ने भी पीछे न हटते हुए 28 यूनिट रक्तदान कर डाला। वहां मौजूद हर शख्स का बस यही कहना था कि सड़क पर सुरक्षा देना जितना जरूरी है, अस्पताल के बिस्तर पर दम तोड़ते किसी इंसान को बचाना भी उतना ही बड़ा धर्म है।
शहर की संस्थाओं और विभागों ने भी दिया इंसानियत का साथ
इस मुहिम का असर सिर्फ पुलिस या माइनिंग तक ही सीमित नहीं रहा। नगर परिषद की टीम ने 4 यूनिट, स्वास्थ्य विभाग ने 2 यूनिट और अन्य नागरिकों ने 6 यूनिट रक्तदान किया। शहर में जमीन पर काम करने वाली संस्थाओं इंसानियत फाउंडेशन और गरीबों का मसीहा के कार्यकर्ताओं ने भी 3-3 यूनिट खून देकर इस मुहिम को ताकत दी। कुल मिलाकर शाम तक 87 यूनिट रक्त जमा हो चुका था। सिविल सर्जन डॉ. प्रवीण कुमार संथालिया ने जब सुबह दीप जलाकर इस शिविर की शुरुआत की थी, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि दोपहर ढलते-ढलते यह एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले लेगा। रक्तदान करने वाले हर नौजवान के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी, जिसे प्रशासन ने सम्मान पत्र देकर और बढ़ा दिया।
अब हर महीने लगेगा शिविर, खून की कमी से नहीं जाएगी किसी की जान
अक्सर छोटे शहरों में ब्लड बैंकों में खून का टोटा पड़ जाता है और गंभीर मरीजों को बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। इसी चिंता को दूर करने के लिए उपायुक्त मेघा भारद्वाज ने एक बड़ा भरोसा दिलाया है। उनका कहना है कि किसी भी लाचार मरीज के लिए एक यूनिट खून जीवनदान की तरह होता है। जिले के अस्पतालों में कभी रक्त की कमी न हो, इसके लिए अब प्रशासन सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हर महीने प्रखंड स्तर पर भी इसी तरह के शिविर लगाएगा। वहीं डॉक्टरों का भी यही मानना है कि लोगों के मन से रक्तदान को लेकर जो थोड़ा-बहुत डर रहता है, वह ऐसे आयोजनों को देखकर खत्म होता है। पाकुड़ ने सोमवार को जो नजीर पेश की है, वह बताती है कि समाज मिलकर चले तो किसी भी जरूरतमंद की सांसें नहीं थमने पाएंगी।
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