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Home » डिजिटल अरेस्ट का खौफ दिखा 11 लोगों को लगाया चूना, CID ने रांची से दबोचा संदेही
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डिजिटल अरेस्ट का खौफ दिखा 11 लोगों को लगाया चूना, CID ने रांची से दबोचा संदेही

March 28, 2026No Comments6 Mins Read
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Ranchi : एक फोन कॉल… फिर वीडियो कॉल… और उसके बाद डर, घबराहट और लगातार दबाव। सामने वाला खुद को पुलिस, सीबीआई या किसी बड़ी जांच एजेंसी का अफसर बताता है और कहता है कि आप पर गंभीर केस चल रहा है। बस यहीं से शुरू होता है डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर ठगी का खेल। झारखंड CID ने ऐसे ही एक मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए रांची के अरगोड़ा थाना क्षेत्र के रहने वाले विवेक नारसरिया को गिरफ्तार कर लिया है। आरोपी पर आरोप है कि वह डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर लोगों से लाखों रुपये ठगता था। CID की यह कार्रवाई HDFC बैंक की ओर से दर्ज कराए गए केस के आधार पर की गई है। इस मामले में भारतीय न्याय संहिता और आईटी एक्ट की कई धाराएं लगाई गई हैं।

एक नाम, एक कंपनी और 11 केसों का कनेक्शन

CID की जांच में जो बात सामने आई, उसने जांच अधिकारियों को भी चौंका दिया। आरोपी “Manish Furnishing Company” के नाम से खोले गए बैंक खाते का इस्तेमाल कर रहा था। बाहर से देखने पर यह एक सामान्य कंपनी का खाता लगता है, लेकिन अंदर की कहानी कुछ और ही थी। CID को पता चला कि यही बैंक खाता देश के अलग-अलग राज्यों में दर्ज 11 डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड मामलों से जुड़ा हुआ है। यानी यह कोई एक-दो बार किया गया अपराध नहीं था, बल्कि ठगी का एक पूरा सिस्टम था, जो लंबे समय से चल रहा था।

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CID DSP नेहा बाला का कहना है कि आरोपी का नेटवर्क सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं था। इस ठगी की जड़ें देश के कई हिस्सों तक फैली हुई हो सकती हैं।

कैसे फंसते थे लोग, डर का खेल था पूरा प्लान

डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में सबसे बड़ा हथियार होता है डर। CID के अनुसार आरोपी लोगों को फोन कर खुद को पुलिस, सीबीआई या किसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताता था। इसके बाद सीधे बात अपराध पर लाई जाती थी। पीड़ित को बताया जाता था कि उसका नाम मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स या किसी बड़े फाइनेंशियल अपराध में आ गया है। कई बार तो यह भी कहा जाता था कि आपके आधार कार्ड और बैंक खाते का इस्तेमाल अपराध में हुआ है। जैसे ही यह बात कही जाती थी, सामने वाला व्यक्ति घबरा जाता था। और यही घबराहट ठगों के लिए सबसे बड़ी जीत होती थी।

वीडियो कॉल पर नकली ऑफिस का बनाते थे माहौल

CID को जांच में पता चला कि ठगी करने वाले सिर्फ फोन कॉल तक सीमित नहीं रहते थे। वे वीडियो कॉल करते थे और ऐसा माहौल बनाते थे जैसे कोई असली ऑफिस हो। कई मामलों में देखा गया है कि ठग पुलिस की वर्दी जैसी ड्रेस पहन लेते हैं या पीछे दीवार पर सरकारी दफ्तर जैसा बैकग्राउंड लगा देते हैं। पीड़ित को लगता है कि वह सच में किसी अधिकारी से बात कर रहा है। बस यहीं पर पीड़ित की समझ कमजोर पड़ जाती है और वह ठग के जाल में पूरी तरह फंस जाता है।

कॉल काटने नहीं देते थे, लगातार बनाते थे दबाव

CID की जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी पीड़ित को लगातार कॉल पर बनाए रखता था। उसे कहा जाता था कि फोन मत काटिए, वरना तुरंत गिरफ्तारी होगी। पीड़ित को घंटों तक वीडियो कॉल पर रोके रखा जाता था ताकि वह किसी रिश्तेदार, दोस्त या बैंक कर्मचारी से सलाह न ले सके। डर का माहौल इतना बढ़ा दिया जाता था कि लोग घबराकर तुरंत पैसे ट्रांसफर कर देते थे।

“सेफ अकाउंट” का झांसा, और फिर पैसे गायब

सबसे बड़ा झूठ होता था “सेफ अकाउंट” का। आरोपी पीड़ित को कहता था कि जांच प्रक्रिया के लिए आपके खाते की रकम सुरक्षित करना जरूरी है। इसके बाद कहा जाता था कि पैसे एक “सेफ अकाउंट” में जमा कर दीजिए, जांच पूरी होते ही पैसा वापस मिल जाएगा। डरे हुए लोग सोचते थे कि चलो पैसा तो वापस आ जाएगा, जान बच जाए। लेकिन जैसे ही पैसा ट्रांसफर होता, खेल खत्म हो जाता। पैसा तुरंत दूसरे खातों में भेज दिया जाता और पीड़ित को बाद में समझ आता कि उसके साथ ठगी हो चुकी है।

फर्जी और किराए के खाते, जिनसे घूमता था पैसा

CID की जांच में यह भी बात सामने आई कि आरोपी फर्जी या किराए पर लिए गए बैंक खातों का इस्तेमाल करता था। इन्हें म्यूल अकाउंट कहा जाता है। इन खातों की खासियत यही होती है कि पैसा आते ही तुरंत दूसरे खाते में चला जाता है। कई बार एक ही रकम कुछ मिनटों में 4 से 5 खातों में घुमा दी जाती है, ताकि पुलिस ट्रेस न कर सके। CID को शक है कि इस गिरोह में ऐसे कई लोग शामिल हो सकते हैं जो अपने नाम पर या फर्जी नाम पर खाते खुलवाकर ठगों को दे रहे थे।

गिरफ्तारी के वक्त क्या मिला

CID ने आरोपी विवेक नारसरिया को गिरफ्तार करते हुए उसके पास से मोबाइल फोन, सिम कार्ड और कई डिजिटल सबूत बरामद किए हैं। अब CID इन सबूतों की तकनीकी जांच कर रही है। कॉल रिकॉर्ड, चैट, बैंक ट्रांजेक्शन, लोकेशन और दूसरे डिजिटल डेटा से यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस ठगी के पीछे कौन-कौन लोग हैं और पैसा कहां-कहां भेजा गया। CID का मानना है कि इस गिरफ्तारी के बाद कई और नाम सामने आ सकते हैं।

HDFC बैंक के केस से खुली परतें

CID को यह सुराग HDFC बैंक की ओर से दर्ज कराए गए मामले के आधार पर मिला। बैंक ने जब कुछ संदिग्ध ट्रांजेक्शन और शिकायतों का पैटर्न देखा तो इसकी जानकारी पुलिस और जांच एजेंसियों को दी। इसके बाद CID ने तकनीकी जांच शुरू की और धीरे-धीरे खाते की परतें खुलती गईं। आखिरकार जांच की कड़ी विवेक नारसरिया तक पहुंच गई।

CID ने साफ कहा- डरें नहीं, सतर्क रहें

CID ने आम लोगों से अपील की है कि अगर कोई खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या किसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर फोन करे और पैसे मांगे तो तुरंत सतर्क हो जाएं। CID का कहना है कि कोई भी सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती। अगर ऐसी कॉल आए तो घबराएं नहीं। कॉल काटें और तुरंत साइबर थाना या साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराएं।

डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड से बचने का सबसे आसान तरीका

CID ने लोगों को चेतावनी देते हुए कहा है कि

  • कोई भी अधिकारी फोन पर गिरफ्तारी की धमकी देकर पैसे नहीं मांगता
  • वीडियो कॉल पर सरकारी जांच नहीं होती
  • “सेफ अकाउंट” जैसी कोई चीज नहीं होती
  • अगर डराया जा रहा है तो समझिए सामने ठग है

CID की कार्रवाई से साइबर ठगों में खलबली

विवेक नारसरिया की गिरफ्तारी के बाद यह साफ हो गया है कि CID अब डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड को लेकर बेहद गंभीर है। इस कार्रवाई से साइबर ठगों में हड़कंप मच गया है। CID अब आरोपी के संपर्कों, बैंक खातों और मोबाइल डेटा की जांच कर रही है। उम्मीद है कि जल्द ही इस ठगी नेटवर्क से जुड़े और लोगों पर भी शिकंजा कस सकता है।

इसे भी पढ़ें : ताड़ के पेड़ से शुरू हुए लफड़े में खू’नखराबा, चार संदेही गिरफ्तार

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