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Pakur (Jaydev Kumar) : झारखंड के सेवानिवृत्त मदरसा और संस्कृत विद्यालय के शिक्षक आज भी पेंशन सुविधा से वंचित हैं। जबकि हाई कोर्ट ने एक साल पहले ही उनके पक्ष में स्पष्ट आदेश दे दिया था। विभागीय उदासीनता और नए संकल्पों ने इन बुजुर्ग शिक्षकों को एक बार फिर असमंजस की स्थिति में खड़ा कर दिया है।
वर्षों पुरानी मांग, अधूरी उम्मीदें
24 अक्टूबर 2014 को संकल्प संख्या 2020 के तहत राज्य सरकार ने मदरसा और संस्कृत विद्यालयों के शिक्षकों को पेंशन सुविधा दी थी। इस फैसले ने हजारों परिवारों को राहत दी। लेकिन 21 जून 2018 को रघुवर दास सरकार ने नया संकल्प (संख्या 1773) जारी कर इस सुविधा को रद्द कर दिया। अचानक मिली इस चोट ने कई शिक्षकों को आर्थिक संकट में डाल दिया।
न्याय की लड़ाई और उम्मीद की किरण
पेंशन छिन जाने से आहत शिक्षक अदालत की शरण में गए। 17 मई 2024 को न्यायमूर्ति एस.एन. पाठक ने उनकी पीड़ा को समझते हुए संकल्प संख्या 1773 को निरस्त कर दिया और पुराने संकल्प 2020 को बहाल करने का आदेश दिया। अदालत ने तीन महीने के भीतर पेंशन शुरू करने का निर्देश भी दिया। इस फैसले से शिक्षकों को उम्मीद जगी कि अब उनका बुढ़ापा सुरक्षित होगा।
नया संकल्प और नई परेशानी
लेकिन 10 सितंबर 2025 को पेंशन विभाग ने संकल्प संख्या 3486 जारी कर दिया। शिक्षक संघ का कहना है कि यह आदेश अदालत के आदेश के खिलाफ है और सीधी अवमानना है। शिक्षकों का आरोप है कि विभाग जानबूझकर फैसले को लागू नहीं कर रहा।
संघर्षरत सेवानिवृत्त शिक्षक
रांची में 21 सितंबर 2025 को हुई बैठक में सेवानिवृत्त शिक्षकों ने अपने दर्द को सामने रखा। उनका कहना है कि विभागीय उदासीनता के कारण वे पेंशन राशि से अब तक वंचित हैं। उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें उम्मीद थी कि सरकार उनका साथ देगी, लेकिन स्थिति उलट है। “हमने जीवनभर शिक्षा दी, अब जब हमारी बारी आई तो सरकार आंखें मूंद रही है,” एक वृद्ध शिक्षक ने भावुक होकर कहा।
शि7क संघ ने दे डाली चेतावनी
शिक्षक संघ ने चेतावनी दी है कि अगर शीघ्र ही पेंशन बहाल नहीं की गई तो वे बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। यह सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं है बल्कि सम्मान और न्याय की लड़ाई है। झारखंड के हजारों सेवानिवृत्त शिक्षकों की निगाहें अब सरकार और न्यायपालिका पर टिकी हैं।
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