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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : सुबह के आठ बजे जब शहर के बच्चे स्कूल बस की खिड़की से हाथ हिला रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त रामगढ़ के दंदुवाजारा गांव के बच्चे अपनी पैंट घुटनों तक समेट रहे होते हैं। वजह कोई खेल नहीं, बल्कि गांव के बाहर पसरा वो कच्चा, उबड़-खाबड़ और कटा हुआ रास्ता है, जो उनके घर और स्कूल के बीच दीवार बनकर खड़ा है। मंगलवार को जब यही नन्हे-मुन्ने कदम कंधे पर बस्ता लटकाए सीधे जिले के डीसी के जनता दरबार पहुंचे, तो वहां मौजूद हर शख्स का दिल पसीज गया। इन मासूमों के चेहरे पर डर नहीं, बल्कि पढ़ाई छूट जाने की एक गहरी फिक्र थी। बच्चों ने हाथ जोड़कर बस इतना ही कहा कि साहब, हमारे गांव तक एक रास्ता बनवा दीजिए, हम रोज बिना गिरे स्कूल जाना चाहते हैं।

जब रेल की पटरी संवरने लगी और गांव का इकलौता रास्ता कट गया
दंदुवाजारा गांव की यह तकलीफ अचानक पैदा नहीं हुई है। ग्रामीणों की मानें तो कुछ समय पहले रेलवे की ओर से यहां नाला निर्माण का काम कराया गया था। काम तो हुआ, लेकिन उसी दौरान गांव को दुनिया से जोड़ने वाली इकलौती कच्ची सड़क को काट दिया गया। ठेकेदार और मजदूर काम खत्म करके चले गए, मगर पीछे छोड़ गए एक गहरा दर्द। इसके बाद से गांव का संपर्क मुख्य मार्ग से ऐसा टूटा कि आज तक नहीं जुड़ पाया। गड्ढों और पत्थरों से भरी इस राह पर कोई तिपहिया वाहन तो दूर, साइकिल चलाना भी जंग जीतने जैसा है। स्कूल बस चालकों ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं कि वे इस टूटी राह पर गाड़ी नहीं ला सकते। इसका सीधा असर इन मासूमों की पढ़ाई पर पड़ा, जिन्हें रोज कई किलोमीटर का सफर पैदल नापना पड़ता है।
खाट पर मरीज और कीचड़ में फिसलते कदम, हर दिन एक नई जंग
इस टूटी सड़क का दर्द सिर्फ स्कूल के बच्चों तक सीमित नहीं है, यह पूरे गांव की बेबसी की कहानी है। गांव में कोई बुजुर्ग अचानक बीमार पड़ जाए या किसी गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो, तो एंबुलेंस गांव के मुहाने पर आकर रुक जाती है। परिजनों के पास मरीज को खाट पर लादकर या पैदल कंधे के सहारे मुख्य सड़क तक ले जाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं बचता। बरसात के दिनों में तो जिंदगी पूरी तरह थम जाती है। पूरा रास्ता दलदल का रूप ले लेता है, जहां जरा सी चूक का मतलब है हाथ-पैर तुड़वा बैठना। बारिश होते ही बच्चे कई-कई दिनों तक स्कूल का मुंह नहीं देख पाते, क्योंकि कीचड़ से सने कपड़ों के साथ वे क्लास में बैठ भी नहीं सकते।
पढ़ाई की उम्र में हक की लड़ाई, अब हुक्मरानों से उम्मीद
जिस उम्र में बच्चों को मैदान में तितलियों के पीछे भागना चाहिए था, उस उम्र में उन्हें अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए अफसरों की चौखट पर दस्तक देनी पड़ रही है। जनता दरबार में बच्चों का इस तरह बस्ता टांगकर पहुंचना पूरे सिस्टम के चेहरे पर एक आईने की तरह है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पंचायत से लेकर कई दफ्तरों के चक्कर काटे, लेकिन किसी ने उनकी सुध नहीं ली। थक-हारकर जब बच्चों ने खुद अपने भविष्य की खातिर आवाज उठाई, तो गांव वालों के मुरझाए चेहरों पर भी एक उम्मीद जागी है। अब सबकी निगाहें जिले के आला अफसरों पर टिकी हैं कि क्या वे रेलवे और संबंधित महकमों के साथ मिलकर इन मासूमों के लिए एक सुरक्षित रास्ता बना पाएंगे, ताकि इनकी पढ़ाई का सफर यूं पत्थरों से न टकराए।
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