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Giridih : गिरिडीह की बारिश भरी उस शाम को शायद ही कोई भूल पाए। मूसलाधार बारिश और गांधी चौक की हलचल के बीच लोग दुकान-दुकान भाग रहे थे। अपने सामान समेट रहे थे। कपड़ों की खरीदारी के लिए आया मंगरोडीह गांव का छोटा अंकुश ठाकुर अपनी मां की गोद में मासूमियत से बारिश की बूंदें देख रहा था। मां की हथेली उसके सिर पर थी, मानो कह रही हो… “डर मत बेटा, मां है न।” लेकिन किसे पता था कि अगले ही पल यह सुकून भरा अहसास एक खामोश चीख में बदल जाएगा।
मां की गोद से छूटा ‘दुलार’
बारिश का बहाव तेज हुआ तो मां नाले के किनारे ठहर गई। भीगे कपड़े, फिसलन और अचानक आई हवा ने संतुलन बिगाड़ दिया। अंकुश उसकी गोद से फिसला और “अम्मा!” की हल्की सी आवाज के साथ नाले की तेज धार में समा गया। मां ने चीखते हुए हाथ बढ़ाए, पिता भागते हुए कूद पड़े, लेकिन पानी का वेग किसी निर्दयी राक्षस की तरह मासूम को बहाकर ले गया। कुछ सेकंड की यह घटना उस मां की जिंदगी से सारी खुशियां छीन ले गई।
रातभर चला तलाश का संघर्ष
हादसे की खबर जंगल में आग की तरह फैली। पुलिस, नगर निगम और प्रशासन की टीम दौड़कर मौके पर पहुंची। जेसीबी मशीन गड़गड़ाई, नाले की दीवारें टूटीं, पंपों से पानी निकला। हर आंखें बस एक उम्मीद से टिकी रहीं… अंकुश कहीं तो दिखेगा। लेकिन अंधेरा और बारिश सब कुछ निगलते रहे। इस बीच मंदिर की घंटियों के बीच एक मां ने पूरी रात अपने लाडले की सलामती के लिए प्रार्थना की, शायद भगवान से सौदा किया होगा… “मेरा बेटा लौटा दो, मेरी सांसें ले लो।”
सुबह की उम्मीद और फिर लोगों का गुस्सा
रविवार की सुबह एक नई उम्मीद लेकर आई। फिर से नाले की गहराई टटोली गई, हर कोना खंगाला गया। लेकिन बच्चे का कोई सुराग न मिलने से इलाके का गुस्सा फूट पड़ा। लोग सड़क पर उतर आए, नारेबाजी करने लगे। प्रशासन पर सवाल उठे… “अगर वक्त पर कदम उठाया जाता, तो मासूम को बचाया जा सकता था।”
इकलौता बेटा है अंकुश
अंकुश ठाकुर इकलौता बेटा है। माता-पिता के सपने उसी पर टंगे है। वह कभी डॉक्टर बनेगा, कभी इंजीनियर – यह सब अब शायद सिर्फ कल्पना रह जाएगी। बेबस मां की आखें बस अपने बेटे का सही-सलामत लौटने की राह देख रही है।
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