अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Pakur (Jaydev Kumar) : सुबह का वक्त था। पाकुड़ के एक सरकारी स्कूल के आंगन में बच्चे कतार में खड़े थे। कोई कविता दोहरा रहा था, तो कोई मैदान में गेंद को लपकने की कोशिश कर रहा था। कुछ साल पहले तक यही बच्चे स्कूल से दूर थे या चुपचाप आखिरी बेंच पर बैठे रहते थे। आज उनके चेहरे पर आत्मविश्वास है और आंखों में आगे बढ़ने का सपना। यही बदलाव है परख पढ़ाई और खेल का, जिसने पाकुड़ की तस्वीर ही नहीं बदली, बल्कि अब राष्ट्रीय मंच पर जिले का नाम रोशन किया है। इस पहल को स्कॉच अवार्ड 2025 के लिए चुना गया है।
जब स्कूल फिर से अपना लगा
पाकुड़ जैसे आदिवासी और ग्रामीण बहुल जिले में पढ़ाई अक्सर बोझ मानी जाती थी। गरीबी, पलायन और घरेलू जिम्मेदारियों के कारण कई बच्चे स्कूल छोड़ देते थे। जिला प्रशासन ने इसे चुनौती की तरह लिया और फिर से स्कूल चले हम अभियान शुरू किया। शिक्षकों ने गांव गांव जाकर बच्चों और अभिभावकों से बात की। स्कूल सिर्फ इमारत नहीं, भरोसे की जगह बने, यही सोच थी।
बोलने से बढ़ा आत्मविश्वास
कई बच्चे पढ़ तो लेते थे, लेकिन बोलने से डरते थे। ‘बोलेगा पाकुड़’ और ‘बात तो करनी होगी’ जैसी पहल ने इस खामोशी को तोड़ा। कक्षा में खुली बातचीत शुरू हुई। बच्चों को मंच मिला, अपनी बात रखने का हौसला मिला। आज वही बच्चे बेझिझक सवाल करते हैं और जवाब भी देते हैं।
परख टेस्ट से समझ आया बच्चों का स्तर
हर बच्चा एक जैसा नहीं सीखता। इसे समझते हुए परख टेस्ट शुरू किया गया। इसका मकसद नंबर देना नहीं, बल्कि यह जानना था कि बच्चा कहां अटक रहा है। शिक्षक उसी हिसाब से पढ़ाने लगे। धीरे धीरे बच्चों की समझ मजबूत होती गई।
जन्मदिन बना स्कूल का त्योहार
सरकारी स्कूलों में तिथि भोजन सह जन्मोत्सव ने माहौल बदल दिया। बच्चों का जन्मदिन अब स्कूल में मनाया जाता है। गांव के लोग साथ आते हैं, भोजन बनता है, मुस्कान बंटती है। स्कूल बच्चों के लिए घर जैसा महसूस होने लगा।
रोज एक पन्ना, रोज एक सीख
एक पन्ना रोज का और आज क्या सीखें जैसी छोटी पहल ने बड़ा असर दिखाया। बच्चों ने लिखना शुरू किया, अपनी सोच को शब्द देने लगे। सीख अब सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रही।
मेहनत को मिली पहचान
इस पूरी यात्रा के पीछे जिला प्रशासन, शिक्षक और समुदाय की साझा मेहनत है। उपायुक्त मनीष कुमार कहते हैं कि पढ़ाई और खेल को जोड़कर बच्चों के सर्वांगीण विकास का सपना देखा गया था। स्कॉच अवार्ड के लिए चयन उस सपने की पहचान है।
उम्मीद की मिसाल
पाकुड़ की कहानी संदेश दे गयी कि संसाधन कम हों, तब भी सोच बड़ी हो तो बदलाव मुमकिन है। यहां स्कूल सिर्फ पढ़ने की जगह नहीं रहे, बल्कि बच्चों के सपनों की पहली सीढ़ी बन गए। अब यह कहानी सिर्फ पाकुड़ की नहीं, पूरे देश के लिए एक सीख है।
इसे भी पढ़ें : आठ साल का इंतजार और टूटती उम्मीदें, दर-दर भटकता एक किसान

