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Ranchi : सर्दियों की हल्की दस्तक और दिवाली की तैयारी के बीच रांची का मोराबादी मैदान एक बार फिर नई चमक बिखेरने के लिए तैयार हो रहा है। मौका है झारखंड आईएएस ऑफिसर्स वाइव्स एसोसिएशन (जेसोवा) के वार्षिक दिवाली मेले का, जो 29 अक्टूबर से 2 नवंबर तक चलेगा। सुबह 11 बजे से रात 9 बजे तक चलने वाला यह मेला सिर्फ रोशनी, कपड़ों और पकवानों की खरीद-फरोख्त का ठिकाना नहीं है, बल्कि इसके पीछे समाज को बदलने की एक बहुत शांत और संजीदा कोशिश छिपी हुई है। सोमवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में संस्था की अध्यक्ष प्रीति कुमार, उपाध्यक्ष अनीता सिन्हा, सचिव मनु झा, कोषाध्यक्ष शिवानी सिंह, संयुक्त सचिव श्वेता शुक्ला और कार्यकारिणी सदस्य जेसीना सिद्दीकी ने मेले का पोस्टर और ब्रोशर जारी करते हुए इस खूबसूरत सफर की तस्वीर सामने रखी।
साल 2000 में शुरू हुआ जेसोवा आज अपनी सेवा के 25 साल पूरे कर चुका है। इन ढाई दशकों में यह मंच केवल बड़े अधिकारियों के परिवारों की बैठकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने झारखंड के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाने का काम किया है। मेले से जुटाया गया एक-एक पैसा ग्रामीण कारीगरों, महिला उद्यमियों, जरूरतमंद बच्चों और बुजुर्गों के जीवन को बेहतर बनाने में लगाया जाता है।
अध्यक्ष प्रीति कुमार का सपना… किताबों से रोशन हो रहा गांव का भविष्य
इस पूरे सामाजिक अभियान की सबसे खूबसूरत कड़ी संस्था की अध्यक्ष प्रीति कुमार की दूरदर्शी सोच में नजर आती है। प्रीति ने यह गहराई से समझा कि अगर किसी समाज की बुनियादी तस्वीर बदलनी है, तो उसका रास्ता केवल और केवल किताबों से होकर गुजरता है। उनकी संवेदनशीलता और जमीनी सोच का ही नतीजा है कि उन्होंने झारखंड के हर जिले में आधुनिक और डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित करने का बीड़ा उठाया। अक्सर सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर शहरों में बड़ी बातें होती हैं, लेकिन प्रीति ने उन सुदूर गांवों की सुध ली जहां बच्चों के पास प्रतियोगी परीक्षाओं की महंगी किताबें खरीदने के पैसे नहीं होते।
उनकी इस मजबूत पहल से रांची के बेड़ो और लापुंग जैसे ग्रामीण प्रखंडों के साथ-साथ सिमडेगा के हेरिटेज भवन में अत्याधुनिक पुस्तकालय शुरू हो चुके हैं। इन पुस्तकालयों में केवल चारदीवारी और कुर्सियां नहीं हैं, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी 5 हजार से ज्यादा किताबें, ई-संसाधन, डिजिटल पढ़ाई की व्यवस्था, आरामदायक फर्नीचर, निर्बाध बिजली और सीसीटीवी की सुरक्षा दी गई है। प्रीति कुमार की यह पहल उन सैकड़ों ग्रामीण युवाओं के लिए उम्मीद की नई किरण बन चुकी है जो अभावों के बीच अफसर या शिक्षक बनने का सपना देख रहे हैं। उन्होंने समाज के बुद्धिजीवियों से भी खुलकर अपील की है कि वे इन पुस्तकालयों में नई किताबें दान करें, ताकि ज्ञान की यह रोशनी कभी मद्धम न पड़े।
मोराबादी में दिखेगा मिनी भारत, कला और संस्कृति का महासंगम
इस बार का पांच दिवसीय मेला अपनी सांस्कृतिक विविधता के मामले में भी बहुत खास होने जा रहा है। यहां आपको एक ही छत के नीचे मिनी भारत की झलक मिलेगी। गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड के कोने-कोने से दस्तकार अपने हुनर के साथ रांची पहुंच रहे हैं। सुदूर गांवों की जो महिलाएं साल भर घर के आंगन में मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से सोहराई, कोहबर या मधुबनी कला उकेरती हैं, उन्हें अपने हुनर का वाजिब दाम दिलाने का यह बहुत बड़ा मंच बनता है। हथकरघा परिधानों के साथ-साथ झारखंड के लजीज पारंपरिक व्यंजनों की महक भी मेले के माहौल को घरेलू और आत्मीय बनाएगी।
मेले को पूरे परिवार के लिए एक उत्सव जैसा रूप दिया गया है। बच्चों और युवाओं के उत्साह को बढ़ाने के लिए यहां पांचों दिन इंटर स्कूल ड्रॉइंग, डांस, फैंसी ड्रेस, लाइव बैंड, क्रॉलिंग बेबी और मॉम एंड बेबी शो जैसी रोमांचक प्रतियोगिताएं होंगी। हर शाम देश के जाने-माने कलाकारों के सुर और थाप मोराबादी की हवाओं में घुलेंगे। लोगों की सहूलियत के लिए मैदान में मोबाइल एटीएम, निशुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर और सरकारी जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देने वाले सहायता केंद्र भी मौजूद रहेंगे।
उत्सव से उपजी संवेदना, जब समाज के हर कोने तक पहुंची मदद
जेसोवा के काम की असली खूबसूरती यह है कि इसका दायरा मेले के खत्म होने के साथ सिमटता नहीं है। संस्था ने राज्य के दूरदराज के इलाकों में चल रहे आंगनबाड़ी केंद्रों को गोद लेकर उन्हें आधुनिक नर्सरी स्कूलों में तब्दील किया है, ताकि गरीब बच्चों को भी शुरुआत से ही आधुनिक तरीके से शिक्षा मिल सके। हाल ही में ओरमांझी के ग्रामीण इलाके में एक बड़ा स्वास्थ्य शिविर लगाया गया, जहां 700 से ज्यादा जरूरतमंद ग्रामीणों की मुफ्त जांच हुई और उन्हें विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह के साथ दवाएं दी गईं।
इतना ही नहीं, हटिया और नगड़ी के वृद्धाश्रमों में जाकर बुजुर्गों के साथ होली मनाना और उनके बीच जरूरी सामान पहुंचाना यह बताता है कि यह संस्था रिश्तों और संवेदनाओं को कितनी अहमियत देती है। जेसोवा का यह 25 सालों का सफर सिर्फ एक संगठन की कामयाबी नहीं है, बल्कि इस बात की मिसाल है कि जब विशेषाधिकार प्राप्त लोग अपनी जिम्मेदारियों को संवेदनशीलता से निभाने लगें, तो समाज के अंधेरे कोनों में भी उम्मीद के दीये जलाए जा सकते हैं।
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