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Ranchi : सुबह की ठंडी हवा में जब रांची की गलियों में बाकी लोग दिन की शुरुआत कर रहे होते हैं, तब तनुश्री द्विवेदी की दिनचर्या पहले से रफ्तार पकड़ चुकी होती है। किताबों के पन्ने, बैग में रखी यूनिफॉर्म और मन में एक ही लक्ष्य… खुद को हर दिन थोड़ा बेहतर बनाना। अब वही लड़की देहरादून में एशियन गेम्स ट्रायल के लिए रिपोर्ट करने जा रही है। यह सिर्फ एक ट्रायल नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, त्याग और भरोसे का इम्तिहान है।
घर से मैदान तक… हौसलों की यात्रा
तनुश्री के घर में कभी बड़े सपनों की बातें जोर से नहीं कही गईं, लेकिन उन्हें जीने की आज़ादी जरूर मिली। पिता पंकज कुमार द्विवेदी और माता रागिनी द्विवेदी ने हर मोड़ पर बेटी का साथ दिया, चाहे सुबह की प्रैक्टिस हो या देर रात की पढ़ाई। दो अन्य भाई-बहनों के बीच पली तनुश्री ने बहुत जल्दी समझ लिया कि सपने अकेले नहीं पूरे होते, परिवार की ताकत साथ हो तो रास्ता आसान बनता है।
तीसरी कक्षा की जिज्ञासा, जो जुनून बन गई
तीसरी कक्षा में वुशू से पहला परिचय हुआ, बस यूं ही। लेकिन वही परिचय 2014 में सब-जूनियर मुकाबलों तक पहुंचा। मोरहाबादी मैदान में कोच दीपक गोप की देखरेख में हर पसीने की बूंद ने भरोसा बढ़ाया। हार से सीख और जीत से संयम, यहीं से तनुश्री का खेल गढ़ा गया। राज्य की सीमाएं टूटीं, राष्ट्रीय मंच मिला और फिर अंतरराष्ट्रीय उड़ान।

पढ़ाई और खेल… दोनों को बराबर सम्मान
तनुश्री आज डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय से बीकॉम फाइनल ईयर की छात्रा हैं। किताबों के बीच अभ्यास का समय निकालना आसान नहीं, लेकिन उन्होंने कभी किसी एक को दूसरे पर तरजीह नहीं दी। उनका मानना है… “खेल अनुशासन सिखाता है और पढ़ाई सोचने की दिशा।” यही संतुलन उन्हें मैदान पर भी मजबूत बनाता है।
जब तिरंगा विदेश में लहराया
जॉर्जिया के बटुमी में आयोजित Batumi Open International Wushu Tournament 2025 में भारत का प्रतिनिधित्व करना तनुश्री के लिए खास पल था। अजनबी जमीन, अलग माहौल… लेकिन कदमों में वही आत्मविश्वास। उस अनुभव ने उन्हें सिखाया कि दबाव में भी शांत रहना ही असली ताकत है।
मेडलों की सूची नहीं, मेहनत की कहानी
सब-जूनियर से सीनियर तक… कांस्य, रजत और स्वर्ण। फेडरेशन कप में स्वर्ण की चमक हो या इंटर यूनिवर्सिटी में जीत… हर पदक के पीछे घंटों की प्रैक्टिस और कई बार छूटे हुए त्योहार हैं। यही वजह है कि जब उनका नाम एशियन गेम्स की संभावित टीम में आया, तो वह खुशी से ज्यादा जिम्मेदारी का एहसास था।
तीन खिलाड़ी, एक उम्मीद
तनुश्री के साथ प्लूटो दीप सिंह और फनीभूषण बेदिया भी ट्रायल में उतरेंगे। तीनों अलग-अलग कहानियां हैं, लेकिन लक्ष्य एक—एशिया के सबसे बड़े मंच पर झारखंड का नाम रोशन करना। देहरादून में होने वाला यह ट्रायल उनके लिए चयन से कहीं ज्यादा है; यह उस भरोसे की कसौटी है, जो उन्होंने खुद पर रखा है।

अंत में… सपना, जो सबका हो गया
तनुश्री कहती हैं, “मैं अकेली नहीं जीतती, मेरे साथ मेरा परिवार, मेरे कोच और मेरा झारखंड जीतता है।” शायद यही मानवीय सच उनकी कहानी को खास बनाता है। यह सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि उस भरोसे की जीत है जो छोटे कदमों से बड़े सपनों तक पहुंचाता है।
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