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Ranchi : अक्सर जब घर का कोई नन्हा सदस्य बीमार पड़ता है, तो पूरा परिवार परेशान हो जाता है। कभी समझ नहीं आता कि सर्दी-खांसी मामूली है या कोई गंभीर संकेत। माता-पिता की इसी फिक्र, बच्चों की बदलती बीमारियों और आधुनिक चिकित्सा के तौर-तरीकों को लेकर शनिवार को राजधानी के आईएमए भवन में चिकित्सा जगत के दिग्गजों का बड़ा जमावड़ा लगा। मौका था इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (आईएपी) रांची की ओर से आयोजित 5वें ‘रांची पेडीकॉन 2026’ का। देश के कोने-कोने से जुटे बाल रोग विशेषज्ञों ने यहां सिर्फ मेडिकल थ्योरी पर बात नहीं की, बल्कि सीधे उस दर्द और चुनौतियों को छुआ, जिससे आज हर दूसरा परिवार दो-चार हो रहा है। कार्यक्रम की थीम भी बेहद खास रही… बच्चों की सेहत, संस्कृति और चिकित्सा में उत्कृष्टता।
बीमारी की समय पर पहचान: माता-पिता की सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव
सम्मेलन के शुरुआती सत्र में डॉक्टरों ने एक बहुत ही बुनियादी मगर जरूरी मुद्दे पर बात रखी। विशेषज्ञों का कहना था कि बच्चों के मामले में देरी जानलेवा साबित हो सकती है। बच्चे अपनी तकलीफ बोलकर नहीं बता पाते, ऐसे में उनके व्यवहार, सांस लेने के तरीके या खान-पान में आए बदलाव को समझना सीधे अभिभावकों की जिम्मेदारी बन जाती है। डॉक्टरों ने साफ किया कि अगर शुरुआती दिनों में ही लक्षणों को पहचान कर सही विशेषज्ञ से सलाह ले ली जाए, तो जन्मजात और जटिल बीमारियों को भी समय रहते काबू में किया जा सकता है। अब मेडिकल साइंस में ऐसी उन्नत जांच पद्धतियां मौजूद हैं, जिनसे बेहद कम समय में सटीक बीमारी का पता चल जाता है।
मंच पर जुटे देशभर के दिग्गज, साझा किए बरसों के तजुर्बे
इस खास सम्मेलन की खासियत यह रही कि इसमें केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर के नामी चेहरों ने शिरकत की। कार्यक्रम में नेशनल प्रेसिडेंट डॉ. नीलम मोहन, दिल्ली के जाने-माने कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. नीरज अवस्थी, डॉ. राजीव मिश्रा, डॉ. पार्थ चौधरी, डॉ. शक्तिपथ दास, डॉ. अमिताभ कुमार, डॉ. राजेश कुमार रानी और डॉ. राजेश कुमार (बालपन) जैसे वरिष्ठ डॉक्टर मौजूद रहे। इन विशेषज्ञों ने बाल हृदय रोग, मौसमी संक्रमण और बच्चों में पोषण की कमी जैसे गंभीर विषयों पर अपने शोध और जमीनी अनुभव साझा किए। डॉक्टरों ने इस बात पर खास बल दिया कि बड़े शहरों के आधुनिक इलाज की तकनीकें कैसे छोटे कस्बों और गांवों तक आसानी से पहुंचाई जा सकती हैं।
जागरूकता से ही बनेगी बात, समाज और डॉक्टर के बीच तालमेल जरूरी
दिनभर चले विचार-विमर्श के बाद विशेषज्ञों का निष्कर्ष यही रहा कि केवल अस्पताल और दवाइयां बच्चों को स्वस्थ नहीं रख सकतीं। इसके लिए पूरे समाज को जागरूक होना पड़ेगा। सही पोषण, समय पर नियमित टीकाकरण और बीमार पड़ने पर बिना नीम-हकीमों के चक्कर काटे सीधे शिशु रोग विशेषज्ञ से संपर्क साधना बेहद जरूरी है। आयोजकों ने बताया कि पेडीकॉन जैसे आयोजनों का मकसद डॉक्टरों के ज्ञान को एक मंच पर लाना और उसे सीधे आम लोगों की भलाई से जोड़ना है। जब डॉक्टर और अभिभावक मिलकर काम करेंगे, तभी नौनिहालों को एक महफूज और सेहतमंद बचपन मिल पाएगा।
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