अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
New Delhi : कुछ कहानियां सिर्फ खबर नहीं होतीं, वो अंदर तक उतर जाती हैं। हरीश राणा की कहानी भी ऐसी ही है। एक ऐसा नौजवान, जिसके पास सपने थे, पढ़ाई थी, भविष्य था… लेकिन एक हादसे ने सब कुछ छीन लिया। 13 साल तक वह जिंदा रहे, लेकिन जिंदगी कहीं पीछे छूट गई थी। और फिर एक दिन ऐसा आया, जब उन्हें आखिरकार उस दर्द से मुक्ति मिली, जो हर दिन उन्हें तोड़ता रहा।
रक्षाबंधन का दिन… और जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़
साल 2013, अगस्त का महीना, रक्षाबंधन का दिन। हरीश अपनी बहन से फोन पर बात कर रहे थे। बातचीत में अपनापन था, हंसी थी, भविष्य की बातें थीं। लेकिन उसी दौरान अचानक कुछ ऐसा हुआ, जिसने सब कुछ बदल दिया। पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के बाद हरीश गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तुरंत पीजीआई चंडीगढ़ ले जाया गया। परिवार को उम्मीद थी कि इलाज के बाद सब ठीक हो जाएगा। लेकिन यह उम्मीद धीरे-धीरे टूटने लगी।
एक मेडिकल शब्द… जिसने पूरी जिंदगी बदल दी
कुछ महीनों के इलाज के बाद डॉक्टरों ने जो बताया, उसने सबको अंदर तक हिला दिया। हरीश क्वाड्रिप्लेजिया से ग्रसित हो चुके थे। इसका मतलब था कि उनके हाथ और पैर अब काम नहीं करेंगे। वह खुद से उठ नहीं सकते, बैठ नहीं सकते, यहां तक कि अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहेंगे। यही वह पल था, जब जिंदगी ने पूरी तरह करवट ले ली।
जिंदा थे… लेकिन जी नहीं पा रहे थे
2013 से लेकर 2026 तक का सफर सिर्फ सालों का नहीं, बल्कि हर दिन की लड़ाई का था। हरीश पूरी तरह होश में रहते थे। उन्हें हर चीज का एहसास होता था। लेकिन उनका शरीर उनका साथ नहीं देता था। वह न चल सकते थे, न अपने हाथ हिला सकते थे। सोचिए, एक इंसान जो सब समझता हो, महसूस करता हो, लेकिन कुछ कर न पाए। यह सिर्फ शारीरिक तकलीफ नहीं थी, यह मानसिक पीड़ा भी उतनी ही गहरी थी।
परिवार की लड़ाई… उम्मीद और हकीकत के बीच
हरीश के माता-पिता ने हार नहीं मानी। उन्होंने हर संभव इलाज कराया, हर दरवाजा खटखटाया। लेकिन साल दर साल बीतते गए और हालत जस की तस रही। दर्द कम नहीं हुआ, बल्कि और बढ़ता गया। धीरे-धीरे परिवार के सामने एक कठिन सवाल खड़ा हो गया… क्या यह जिंदगी है… या सिर्फ सांसों का चलना?
जब मजबूरी बनी सबसे बड़ा फैसला
अपने बेटे को इस हालत में देखकर परिवार टूट चुका था। उन्होंने वह फैसला लिया, जिसके बारे में सोचना भी आसान नहीं होता। दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की याचिका दायर की गई। लेकिन 8 जुलाई 2025 को इसे खारिज कर दिया गया। यह एक बड़ा झटका था, लेकिन परिवार ने हार नहीं मानी। वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। करीब आठ महीने तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी। यह सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं था, यह एक लंबे दर्द से राहत की मंजूरी थी।
अस्पताल के वो आखिरी दिन
14 मार्च 2026 को हरीश को एम्स के इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर अस्पताल के पैलिएटिव केयर वार्ड में भर्ती किया गया। यहां इलाज नहीं हो रहा था, बल्कि उन्हें शांति से विदा करने की प्रक्रिया शुरू हुई। डॉक्टरों ने धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट हटाया। खाना और पानी देना बंद कर दिया गया। उनके शरीर को अब जिंदा रखने की कोशिश नहीं की जा रही थी। बल्कि यह सुनिश्चित किया जा रहा था कि उन्हें कोई दर्द न हो। उन्हें लगातार ऐसी दवाएं दी जा रही थीं, जिससे वह शारीरिक और मानसिक तकलीफ से दूर रहें।
10 दिन… और एक लंबी पीड़ा का अंत
करीब 10 दिनों तक यह प्रक्रिया चली। परिवार हर दिन उनके साथ रहा। और फिर वह पल आया, जब हरीश ने अंतिम सांस ली। 13 साल का दर्द, संघर्ष और बेबसी आखिरकार खत्म हो गई। उनकी सांसें थम गईं, लेकिन शायद पहली बार उन्हें सुकून मिला। हरीश अब उस दर्द से मुक्त हैं, जिसे उन्होंने 13 साल तक हर दिन जिया। हरीश राणा अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी कहानी लंबे समय तक लोगों के दिल और दिमाग में रहेगी।
इसे भी पढ़ें : 31 साल के जवान बेटे के लिए मां-बाप ने मांगी मौ’त, SC ने दी इच्छामृ’त्यु की इजाजत



